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Tuesday, December 21, 2010

!!! ढोला-मारू - एक सन्दर्भ !!!

सुपनेहू प्रीतम मन्ने मिलिया, हूँ गले लगी गयी..
डरपतां पलका ना खोली, मति सुपनो हुई जाई...!!

डाक्टर शार्लोट वोदविल ,डी. लिट., पेरिस, का “ढोला-मारू” फ्रेंच में अनूदित होकर छप चूका है. इस विद्वान ने फ्रेंच में एक विस्तृत भूमिका दी है..उन्होंने भूमिका में सम्भावना प्रकट की है के ढोला-मारू की कहानी प्रारंभ में जाटों की कथा रही होगी.उन्होंने ये दिखाया है के इस काव्य में जाटों की अनेक परम्परायें सुरक्षित है.

संदर्भ ग्रन्थ-
मध्ययुगीन प्रेमव्याख्यान
डॉ.श्याम मनोहर पाण्डेय
पेज नंबर- १२४

7 comments:

  1. सिया चौधरी जी
    घणी खम्मा !
    मोकळा रामा श्यामा !


    अब कुछ नया भी पोस्ट करें , कृपया ।

    ~*~आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं !~*~

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  2. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_12.html

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  3. बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पे आने से बहुत रोचक है आपका ब्लॉग बस इसी तह लिखते रहिये येही दुआ है मेरी इश्वर से
    आपके पास तो साया की बहुत कमी होगी पर मैं आप से गुजारिश करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे भी पधारे
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  4. बहुत बहुत आभार अनिल जी...राजेंद्र जी...दिनेश जी...:)

    आप सबके आशीर्वाद से बहुत जल्दी ही में कुछ नया पोस्ट करुँगी...:)

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